वाह मेरी बहन तेरा डिज़ाइनर बुर्का

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*🥀 वाह मेरी बहन तेरा डिज़ाइनर बुर्का 🥀*



📌 आज की बहनों का हाल भी बड़ा अजीब है!
चेहरे पर नक़ाब, स्कार्फ लगाना ये फैशन बन चूका है,
बुर्का फैशन बन चूका ह!
याद रखो इस्लाम बुर्क़े (नक़ाब )को लगाने का हुक्म नही देता,
इस्लाम परदे का हुक्म देता है।
मुमकिन है मेरी बात से कोई इत्तेफ़ाक़ न रखे!
लेकिन ये मेरी बात नही, ये हुज्जतुल इस्लाम इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाही अलैह की फिक्र है!
इमाम ग़ज़ाली ने अपनी सदी में फ़तवा दिया था की जिस बुर्क़े पर डिज़ाइन बनी हो तो, ऐसा बुरा पहनना हराम है।
इसलिए कि वो बुर्का मर्दो को अपनी तरफ मुतवज्जा करता है, 
मर्दो का दिल लुभाता है तो जो बुर्का मर्दो को दावते नज़ारा दे, ऐसा बुर्का औरतों के लिए जाइज़ नही!

📌पहले बुरकों का हाल ये था कि इतना सादा होता था की पहनने वाली औरत का पता नही चलता था कि मोटी है या दुबली,
बूढी है या जवान, लेकिन आज जिस्म की पूरी बनावट का अंदाज़ हो जाता है।
ऐसे-ऐसे मक़ाम पर नग लगे है!
ऐसे-ऐसे मकाम पर एम्ब्रायडी है!
ऐसे-ऐसे कलर के भड़कीले बुर्क़े है,
बुरको की सिलाई ऐसी है कि न देखने वाला भी मुतवज्जा हो जाये!

📌जहाँ पहले नक़ाब हुवा करते थे वहाँ अब नोज़पीस आ गया!
गौर करने वाली बात तो ये है की आज के हज़ारों रूपये का बुर्का पहन कर भी तुम इज़्ज़त को मेहफ़ूज़ न कर सके,
वो पाक मुक़द्दस औरतें जैसे फ़ातिमातुज़्ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा जो 17-17 पेवंद वाली चादर ओढ़ कर निकलती थी,
मगर ग़ैरत का हाल ये था कि हूरे जन्नत भी झाँख-झाँख कर रश्क की निगाहो से देख लिया करती थी।

📌उनकी गैरत का आलम ये था की दामन निचोड़ दे तो फरिश्तें वुज़ू करें, उनके दामन पर पैबंद तो थे लेकिन अल्लाहु अकबर, गुनाहों के धब्बे नही थे, बे पर्दगी के धब्बे नही थे, बुराइयों के धब्बे नही थे!
छोड़ दो इस फ़र्ज़ी परदे को, वो पर्दा करो जिसका हुक्म इस्लाम ने दिया है!
आज से ये अहद कर लीजिये न ऐसा बुर्का पहनेंगे, न खरीदेंगे और न अपनी बहन, बेटी, और बीवी को पहनने देंगे!

👉इंशाअल्लाह
अगर मेरी बात किसी हद तक सही लगे तो अल्लाह के वास्ते अपनें आप में तब्दीली लाईए और जरा गौर कीजिए!
क्या हकीकत में यही दर्स हमें हमारे बुजुर्गों ने दिया है!



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