इसे हल्के में बिल्कुल ना लें

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*🥀 इसे हल्के में बिल्कुल ना लें 🥀*



✏️ क़ाइदा बग़दादी हो, यस्सरनल क़ुरआन हो या कि अम्म पारा, इन सबको पढ़ाने का अस्ल मक़सद यह होता है कि बच्चे को क़ुरआने मजीद पढ़ने का ढ़ंग आ जाए
इसीलिये इनमें ग़लत सलत पढ़ा देने से क़ुरआने मजीद ग़लत सलत पढ़ाना लाज़िम आएगा बल्कि अम्म पारा तो क़ुरआने मजीद का तीस्वाँ पारा है ही और यस्सरनल क़ुरआन में भी क़ुरआने मजीद की बहुत सी आयतें सबक़ में शामिल हैं
प्राइमरी के बहुत से मदरसों में बच्चों को यह सब पढ़ाने वाले सही तलफ्फुज़ का ख़याल नहीं रखते और जैसे तैसे ग़लत सलत तलफ्फुज़ से पढ़ा कर नाम के लिये बच्चों को क़ुरआने मजीद ख़त्म करवा देते हैं

✏️एैसे लोग ज़रा सोचें कि क़ुरआने मजीद में हुरूफ तहज्जी (ا से ی तक) में से सबसे कम ظ हर्फ है और यह भी 853 बार आया है
अब अगर किसी ने बच्चे को ظ का तलफ्फुज़ ج या ز या ذ सिखा दिया तो वह बच्चा एक ख़त्मे क़ुरआन मजीद में इसकी वजह से 853 बार ग़ल्तियाँ करेगा और इन सबका गुनाह उस ग़लत पढ़ाने वाले के नामए आमाल में लिखा जाएगा और ना जाने वह बच्चा अपनी पूरी ज़िंदगी में कितनी बार क़ुरआने मजीद ख़त्म करेगा और इस ग़लत सिखाने वाले को कितना गुनाह मिलेगा (अल्लाह अज़्ज़ वजल की पनाह)

👑यह तो अभी सबसे कम आने वाले हर्फ को ग़लत पढ़ाने की नुक़सान की मिसाल है और वह भी सिर्फ एक हर्फ ग़लत सिखाने की सूरत में है जब्कि अरबी हुरूफे तहज्जी की तादाद 29 है और इनमें से कुछ हुरूफ एैसे भी हैं जो क़ुरआने मजीद में कई हज़ार बार तक भी आए हैं
इन सबका अगर हिसाब लगाया जाए तो गुनाहों का कितना बड़ा अंबार लगेगा यह अल्लाह ही बेहतर जानता है
लिहाज़ा क़ुरआने मजीद को तज्वीद व क़िरत और सिह्हते लफ्ज़ी का ख़याल रखते ख़ुद भी पढ़ें और अपने बच्चों को भी उसी क़ारी या आलिम से पढ़ाएँ जो तज्वीद व क़िरत के साथ पढ़ाना जानता हो
बच्चे को क़ुरआने मजीद पढ़ने में कई साल ही लग जाएँ लेकिन हर्गिज़ हर्गिज़ उसका क़ुरआने मजीद जल्दी ख़त्म कराने के लिये तज्वीद व क़िरत को ना छोड़ें कि बरोज़े क़यामत अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर होकर जवाब देही करनी होगी



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